भीषण गर्मी की पीड़ा को रेखांकित करते मेरे नौ नवगीत
(1) :: बूँद-बूँद को तरसा गाँव :: --------------------------------- बूँद-बूँद को तरसा गाँव । चार बोर हैं पाइपलाइन है, घरों-घरों में टोंटी नल है । कुएँ बहुत हैं ताल खुदे हैं, कहीं न लेकिन किंचित जल है । सूखे पत्ते रूठी छाँव । गैयें प्यासीं, बकरीं प्यासीं, गौरैया में छाई उदासी । तितर-बितर हैं जीव-जन्तु भी, प्यासा उल्लू भरे उँघासी । कौओं की भी सूखी काँव । उधर प्यास है, इधर प्यास है, प्यास खोजती किधर प्यास है । खोज-खोज कर लाते पानी कुछ लोगों का ही प्रयास है । उल्टे पड़ते सारे दाँव । बूँद-बूँद को तरसा गाँव । 000 (2) :: तप रहे हैं प्राण भी :: ----------------------------- गर्मियों में तपी धरती तप रहे हैं प्राण भी । झकर उतरी जंगलों की झुलसतीं हैं पत्तियाँ सब, ठूँठ-से ठाँड़े हैं बिरछा, सिसकतीं हैं डालियाँ सब । लपट लेकर हवा आती तप रहे पाषाण भी । मर च...