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आत्मरक्षण

जोड़-घटाना गुणा-भाग से, इस इकाई से उस दहाई से । वक्त कह रहा गरज-गरज कर, बचो कुएँ से और खाई से । इस मकान से उस दुकान से, चढ़ते-उतरे तापमान से । श्यामलता की गहराई से, गौर वर्ण की चतुराई से । बेमौसम की  अमराई से, चाची, मौसी और ताई से । वर्ग-भेद से, ऊँच-नीच से । बचो कीच से और काई से । ज्ञान संक्रमण, ध्यान आक्रमण । दो धारा में फँसा आचरण । इस दुविधा से,  उस सुविधा से । इस विचार से, उस कविता से । हटना है हर कौलिकता से, जुड़ना है बस मौलिकता से । हमें बचाना है ज़ख्मों को  कीट,मक्खियों की साई से ।                   ---- ईश्वर दयाल गोस्वामी ।                        छिरारी(रहली),सागर                        मध्यप्रदेश ।