हुआ दोगला अब संवेदन
रोज़-रोज़ कवि मरते जाते फिर भी होतीं काव्य-गोष्ठियाँ आनलाइन होते सम्मेलन । हुई खोखली सृजनधर्मिता ख़त्म हुईं मर्यादित बातें हुआ दोगला अब संवेदन । अख़बारों में छप जाने का, आनलाइन कविता पढ़ने का, रोग लगा है कई कवियों को । उनके तरफ न हम मुड़ पाएँ नये लोग भी जुड़ न पाएँ भय उपजा है कई छवियों को । इसीलिए ये जोर लगाते जोर लगाकर शोर मचाते आनलाइन ...