हुआ दोगला अब संवेदन
रोज़-रोज़
कवि मरते जाते
फिर भी होतीं
काव्य-गोष्ठियाँ
आनलाइन
होते सम्मेलन ।
हुई खोखली
सृजनधर्मिता
ख़त्म हुईं
मर्यादित बातें
हुआ दोगला
अब संवेदन ।
अख़बारों में
छप जाने का,
आनलाइन
कविता पढ़ने का,
रोग लगा है
कई कवियों को ।
उनके तरफ न
हम मुड़ पाएँ
नये लोग भी
जुड़ न पाएँ
भय उपजा है
कई छवियों को ।
इसीलिए ये
जोर लगाते
जोर लगाकर
शोर मचाते
आनलाइन
करते हैं नर्तन ।
संभव नहीं
दूर है दर्शन
कठिन रेडियो
पर कुछ कहना
इसीलिए इंस्टा
पर आते ।
गूगल मीट
कराते हर दिन
व्हाट्सऐप के
ग्रुप पर आकर
फीके स्वर में
तीखा गाते ।
इनको कुछ भी
भान नहीं है
कोई भी
अनुमान नहीं है
क्या है कविता
क्या है सर्जन ?
मियाँ एक हैं
मिट्ठू एक
नहीं सुनी औरों
की कविता
केवल अपनी
कह लेते हैं ।
छोड़-छाड़
कानून-कायदा
जहाँ दिखेगा
इन्हें फायदा
उस धारा में
बह लेते हैं ।
बँदर-बाँट
मचाते रहते ।
जोर जुगाड़
लगाते रहते ।
और दिखाते
अपना ठनगन ।
--- ईश्वर दयाल गोस्वामी
छिरारी(रहली),सागर
मध्यप्रदेश ।
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