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केवल मृत्यु ही निश्चित है /

केवल मृत्यु ही निश्चित है । धधक रही मरघट की ज्वाला बाहर - बाहर नगर, गांव के  । प्रचलित होते भीतर - भीतर  अंधे किस्से धूप - छांव के । घाट अनिश्चित, पाट अनिश्चित, संबंधों की बाट अनिश्चित । पथ भी आगे जा  विचलित है । बाहर - बाहर सत्य धधकता भीतर - भीतर अंधियारा है । निश्चित नहीं यहां पर कुछ भी पूर्ण अनिश्चित जग सारा है । ध्यान अनिश्चित, ज्ञान अनिश्चित, ख़ोज पूर्ण विज्ञान अनिश्चित । श्रद्धा,  पूजा सब  विगलित है । जो दिखता है जितना सुलझा, वो भी उतना  ही उलझा है । उलझ रहा है जीवन फंदा  दिखता है  जैसे सुलझा है । हंसी अनिश्चित, ख़ुशी अनिश्चित, पार उतर  बेकसी अनिश्चित । माथे पर, ठप्पा अंकित है । भ्रम फैलातीं हाथों में कुछ खिंचीं लकीरें मक्कारी कीं । पांवों में भी बंधीं बेड़ियां छल,छद्मों कीं, लाचारी कीं । धर्म अनिश्चित, कर्म अनिश्चित, और भाग्य का मर्म अनिश्चित । उठा  हुआ हर हाथ पतित है । केवल मृत्यु ही निश्चित है ।     ०००            --- ईश्वर दयाल गोस्वामी               ...

भीषण गर्मी की पीड़ा को रेखांकित करते मेरे नौ नवगीत

        (1)     :: बूँद-बूँद को तरसा गाँव :: --------------------------------- बूँद-बूँद को तरसा गाँव  । चार बोर हैं पाइपलाइन है, घरों-घरों में टोंटी नल है । कुएँ बहुत हैं ताल खुदे हैं, कहीं न लेकिन किंचित जल है । सूखे पत्ते रूठी छाँव । गैयें प्यासीं, बकरीं प्यासीं, गौरैया में  छाई उदासी । तितर-बितर हैं जीव-जन्तु भी, प्यासा उल्लू भरे उँघासी । कौओं की भी सूखी काँव । उधर प्यास है, इधर प्यास है, प्यास खोजती किधर प्यास है । खोज-खोज कर लाते पानी कुछ लोगों  का ही प्रयास है । उल्टे पड़ते सारे दाँव ।  बूँद-बूँद को  तरसा गाँव ।         000                (2)          :: तप रहे हैं प्राण भी :: -----------------------------         गर्मियों में तपी धरती तप रहे हैं प्राण भी । झकर उतरी जंगलों की झुलसतीं हैं पत्तियाँ सब, ठूँठ-से ठाँड़े हैं बिरछा, सिसकतीं हैं डालियाँ सब । लपट लेकर हवा आती  तप रहे पाषाण भी । मर च...

आत्मरक्षण

जोड़-घटाना गुणा-भाग से, इस इकाई से उस दहाई से । वक्त कह रहा गरज-गरज कर, बचो कुएँ से और खाई से । इस मकान से उस दुकान से, चढ़ते-उतरे तापमान से । श्यामलता की गहराई से, गौर वर्ण की चतुराई से । बेमौसम की  अमराई से, चाची, मौसी और ताई से । वर्ग-भेद से, ऊँच-नीच से । बचो कीच से और काई से । ज्ञान संक्रमण, ध्यान आक्रमण । दो धारा में फँसा आचरण । इस दुविधा से,  उस सुविधा से । इस विचार से, उस कविता से । हटना है हर कौलिकता से, जुड़ना है बस मौलिकता से । हमें बचाना है ज़ख्मों को  कीट,मक्खियों की साई से ।                   ---- ईश्वर दयाल गोस्वामी ।                        छिरारी(रहली),सागर                        मध्यप्रदेश ।

हुआ दोगला अब संवेदन

      रोज़-रोज़        कवि मरते जाते        फिर भी होतीं        काव्य-गोष्ठियाँ       आनलाइन       होते सम्मेलन ।       हुई खोखली       सृजनधर्मिता       ख़त्म हुईं       मर्यादित बातें        हुआ दोगला       अब संवेदन ।       अख़बारों में        छप जाने का,       आनलाइन       कविता पढ़ने का,       रोग लगा है       कई कवियों को ।       उनके तरफ न        हम मुड़ पाएँ       नये लोग भी        जुड़ न पाएँ       भय उपजा है       कई छवियों को ।       इसीलिए ये       जोर लगाते       जोर लगाकर       शोर मचाते       आनलाइन     ...

जनपक्षधरता के कालजयी कवि रमेश रंजक : समीक्षात्मक आलेख ~~ ईश्वर दयाल गोस्वामी

स्मृति-शेष नवगीतकार रमेश रंजक जी के चौदह श्रेष्ठ नवगीतों का चयन, जीवन परिचय सामग्री सहयोग आदरणीय रामकिशोर दाहिया, रमेश रंजक जी के तीसरे नवगीत संग्रह 'हरापन नहीं टूटेगा' की भूमिका सामग्री अनिल जनविजय जी द्वारा एवं वागर्थ समूह में प्रकाशन प्रस्तुति के लिए मनोज जैन 'मधुर' जी, अनामिका सिंह जी को कोटिशः बधाई। रंजक जी का पहला ही नवगीत देखिए जो आज और भी अधिक प्रासंगिक हो चला है- "धूप ने कर्फ्यू लगाया है।" भाव व शिल्प की दृढ़ता के साथ यह कालजयी है। यहाँ तक कि जो प्रतिरोध के स्वर अभिव्यंजित होकर उभरे हैं, वे भी कालजयी हैं। दूसरे नवगीत की पंक्तियों में देखें- "उफ/कलम होते हुए/पाबन्दियों में रह रहा हूँ/कह रहा हूँ।" आत्मग्लानि भी व्यंग्यात्मक सौंदर्य बोध देती है। पूरा नवगीत चित्ताकर्षक है।भाव-शिल्प की नवीनता के लिए तीसरा नवगीत देखिए- "पसलियों के/चटकने को/व्यर्थ जाने दूँ।" क्या अद्भुत आत्मविश्वास का समर्थन है देखें- "गड़ रहा है/ज़हन में बलगम।" एकदम नये प्रतीक में प्रतिरोध को सहजता से कहने का ढंग ही अलग है। चौथे नवगीत में देखें- पाँव जो/आगे बढ़ाता ...

जीवन-घुट्टी

प्रस्तुत है आप सब के समीक्षार्थ एक सामयिक नवगीत --- ::: जीवन-घुट्टी ::: ---------------------- मिली न इनको, जीवन-घुट्टी असमय थमती साँसें । टप-टपा-टप पके आम-सी टपक रही बस लाशें । कहीं न कोई बैठन बूझे प्राणवायु भी कोर दिलासा  यद्यपि उसको  हाज़िर सब है यहाँ विलक्षण और विशेष । साधारण को  बन्द किये हैं सरकारों के अफ़सर दफ़्तर  अस्पताल के बाहर लेटो कहते दवा नहीं है शेष । किसके दर पर टेकें मत्था किसकी चौखट नापें ? बंद दुकानें गई मजूरी, घर में आटा दाल नहीं है  बंद रास्ते  समय बंद है, बंद हुई  सहयोगी बातें । मरने बालों  तक से दूरी  लेकिन चलता चाल नहीं है  अस्पताल में  जलते परिजन लाश देखने  तरसीं आँखें । पाँव थमे हैं  हाथ सुन्न हैं पेट सिकुड़ती आँतें ।                       - ईश्वर दयाल गोस्वामी                      168, छिरारी (रहली)                      जिला - सागर (म...

आ रहीं श्रद्धान्जलियाँ

              टूटतीं                बेवक्त कलियाँ,               आ रहीं               श्रद्धान्जलियाँ ।               उखड़ गिरते                नए गुल्ले,               सूखती हैं               जड़ें असमय ।               चटकती हैं                डालियाँ भी,               अनमने हो                रहे किसलय ।               रुक्षता छा               रही  गलियाँ ।               टूटती               बेवक्त कलियाँ ।   ...