केवल मृत्यु ही निश्चित है /
केवल मृत्यु ही निश्चित है । धधक रही मरघट की ज्वाला बाहर - बाहर नगर, गांव के । प्रचलित होते भीतर - भीतर अंधे किस्से धूप - छांव के । घाट अनिश्चित, पाट अनिश्चित, संबंधों की बाट अनिश्चित । पथ भी आगे जा विचलित है । बाहर - बाहर सत्य धधकता भीतर - भीतर अंधियारा है । निश्चित नहीं यहां पर कुछ भी पूर्ण अनिश्चित जग सारा है । ध्यान अनिश्चित, ज्ञान अनिश्चित, ख़ोज पूर्ण विज्ञान अनिश्चित । श्रद्धा, पूजा सब विगलित है । जो दिखता है जितना सुलझा, वो भी उतना ही उलझा है । उलझ रहा है जीवन फंदा दिखता है जैसे सुलझा है । हंसी अनिश्चित, ख़ुशी अनिश्चित, पार उतर बेकसी अनिश्चित । माथे पर, ठप्पा अंकित है । भ्रम फैलातीं हाथों में कुछ खिंचीं लकीरें मक्कारी कीं । पांवों में भी बंधीं बेड़ियां छल,छद्मों कीं, लाचारी कीं । धर्म अनिश्चित, कर्म अनिश्चित, और भाग्य का मर्म अनिश्चित । उठा हुआ हर हाथ पतित है । केवल मृत्यु ही निश्चित है । ००० --- ईश्वर दयाल गोस्वामी ...