आ रहीं श्रद्धान्जलियाँ
टूटतीं
बेवक्त कलियाँ,
आ रहीं
श्रद्धान्जलियाँ ।
उखड़ गिरते
नए गुल्ले,
सूखती हैं
जड़ें असमय ।
चटकती हैं
डालियाँ भी,
अनमने हो
रहे किसलय ।
रुक्षता छा
रही गलियाँ ।
टूटती
बेवक्त कलियाँ ।
खाद-पानी
नहीं मिलता,
प्राणवायु
खो चुकी है ।
हर तरफ़
अंधेर है बस
हद,हदों तक
हो चुकी है ।
शुष्क हैं,बिन
बीज फलियाँ ।
टूटतीं
बेवक्त कलियाँ ।
आ रहीं
श्रद्धान्जलियाँ ।
-- ईश्वर दयाल गोस्वामी ।
छिरारी (रहली)
जिला - सागर
मध्यप्रदेश ।
Jay hind.
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