जीवन-घुट्टी

प्रस्तुत है आप सब के समीक्षार्थ एक सामयिक नवगीत ---

::: जीवन-घुट्टी :::
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मिली न इनको,
जीवन-घुट्टी
असमय
थमती साँसें ।
टप-टपा-टप
पके आम-सी
टपक
रही बस लाशें ।

कहीं न कोई
बैठन बूझे
प्राणवायु भी
कोर दिलासा 
यद्यपि उसको
 हाज़िर सब है
यहाँ विलक्षण
और विशेष ।
साधारण को 
बन्द किये हैं
सरकारों के
अफ़सर दफ़्तर 
अस्पताल के
बाहर लेटो
कहते दवा
नहीं है शेष ।
किसके दर पर
टेकें मत्था
किसकी
चौखट नापें ?

बंद दुकानें
गई मजूरी,
घर में आटा
दाल नहीं है 
बंद रास्ते 
समय बंद है,
बंद हुई 
सहयोगी बातें ।
मरने बालों 
तक से दूरी 
लेकिन चलता
चाल नहीं है 
अस्पताल में 
जलते परिजन
लाश देखने 
तरसीं आँखें ।
पाँव थमे हैं 
हाथ सुन्न हैं
पेट
सिकुड़ती आँतें । 
 
                   - ईश्वर दयाल गोस्वामी
                     168, छिरारी (रहली)
                     जिला - सागर (म.प्र.)

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